Mysterious Shiv Temple Story In Hindi | Hindi Kahani

Shiv Temple Story In Hindi

Shiv Temple Story In Hindi – वर्ल्डस ऑफ़ वंडर दुनिया के ऐसे अजूबे जो प्राकृतिक और मानव निर्मित संरचनाओं का संकलन है। जो अपनी अद्भुत कला, संरचना और खूबसूरती से मनुष्य को आश्चर्यचकित करते हैं। सन 2000 में स्विस फाउंडेशन ने दुनिया के इन अजूबों की सूची बनाने का फैसला किया और करीब 10 करोड लोगों ने अपना वोट देकर दुनिया के सात अजूबों को चुनो जिनका रिजल्ट 2007 में दुनिया के सामने आया।

यूनेस्को की तरफ से वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा हासिल इटली का लीनिंग टावर ऑफ पीसा भी उन्ही लिस्ट में शामिल था जो पूरी दुनिया में अपने कठिन मार्बल स्ट्रक्चर और अविश्वसनीय झुकाव की वजह से लोगों के बीच खाता प्रचलित है। इस बिल्डिंग का यही झुकाव इसका आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जिसे हर साल लाखों की तादाद में लोग सिर्फ यह देखने पहुंचते देखते हैं कि कैसे कोई स्मारक झुके होने के बावजूद आज भी अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं।

Mysterious Shiv Temple Story In Hindi

इटली के लीनिंग टावर ऑफ पीसा से लगभग 6500 किलोमीटर दूर अपने मंदिरों के प्रख्यात भारत में एक ऐसा मंदिर है जो इटली के लीनिंग टावर ऑफ पीसा से अधिक झुक कर भी गंगा नदी के किनारे शान से खड़ा है। यह मंदिर भगवान शिव की नगरी काशी में सिसिंधिया घाट पर उपस्थित है जिसका नाम रत्नेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर करीब 9 डिग्री झुका हुआ है और इसी के विपरीत टावर ऑफ पीसा बस 4 डिग्री झुका हुआ है।

मंदिर का के जुकाम का असल कारण कोई नहीं जानता। क्या यह कोई संरचनात्मक समस्या है? या फिर कोई श्राप? इस मंदिर को किसने बनवाया, इसको लेकर भी बड़ा विवाद रहा है। वहां के पुराने लोगों की माने तो मंदिर को राजा मानसिंह के एक सेवक ने अपनी मां रतनाबाई के लिए 500 वर्ष पूर्व बनवाया था।

मंदिर के निर्माण के बाद सेवक ने गर्वतापूर्ण हर जगह फैलाना शुरू कर दिया कि उसने अपनी मां का कर्ज मंदिर बनवा कर चुका दिया है और फिर उसकी माँ ने गुस्से के भाव से मंदिर को झुकने का श्राप दे दिया की एक माँ का क़र्ज़ कोई नहीं चुका सकता। मतरुरण यानी मां का क़र्ज़ के नाम से मशहूर है मंदिर इसी कारण झुकता जा रहा है।

एक और मान्यता की अगर मानें तो मंदिर के झुकाव का कारण घाट के वजन को बताया जाता है। जो कुछ वर्ष पहले गया था। मंदिर उसका वजन संभाल नहीं पाया और पीछे की तरफ झुक गया। सन 1832 के मशहूर इंग्लिश स्कालर और चित्रकार जेम्स प्रिंसेप ने इस मंदिर को कई बार अपने चित्रों में उकेरा है और उन्हीं चित्रों में यह साफ देखा जा सकता है कि इस वक्त तक मंदिर सीधा था और जुकाम का कोई संकेत नहीं है।

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रहस्य आज भी असल सच्चाई को पर्दे में रखे हुए हैं कि आखिर यह मंदिर किसने बनवाया। रिवेन्यू रिकॉर्ड के अनुसार रत्नेश्वर महादेव मंदिर सन 1825 – 1830 में ग्वालियर की महारानी ने बनवाया था और डिस्ट्रिक्ट कल्चरल कमेटी के अनुसार यह वर्ष 1897 में अमेठी की रॉयल फैमिली ने बनवाया था।

कोई पुख्ता सबूत सबूतों के अभाव में और इतनी सारी कहानियों के बीच ये मंदिर आज भी रहस्यों से घिरा हुआ है। मंदिर का मुख्य द्वार आधा पानी में विलुप्त है और पुजारी हमेशा पानी में जाकर महादेव की आराधना करते हैं। मानसून के समय जब पानी का स्तर बढ़ जाता है तो मंदिर का गुंबद भी गंगा नदी में पूरी तरह से समा जाता है।

भारत के स्थापत्य की जड़े यहां के इतिहास, दर्शन एवं संस्कृति में छुपी हुई है। इस देश की वास्तुकला यहां की परंपरागत एवं भारी प्रभावों का मिश्रण है अथवा भारत में अनेकों ऐसे मंदिर हैं जिनकी अद्भुता और स्थापत्य की तुलना दुनिया की किसी भी स्मारक से करें तो यह मंदिर मीलों दूर आगे ही खड़े होंगे फिर चाहे वह औरंगाबाद का कैलाश मंदिर हो या तमिलनाडु में मीनाक्षी मंदिर।

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इन के आगे सभी स्मारक सब फीके लगते हैं परंतु फिर भी भारत के इन्हीं मंदिरों को कभी भी कोई वर्ल्डस ऑफ़ वंडर जैसी लिस्ट में शामिल तक नहीं किया जाता। क्यों दुनिया भर में भारत के इन्हीं मंदिरों को हमेशा से पहचान नहीं मिलती जिनके ये हक़दार है।

क्यों भारत के स्थापत्य कला के धनी इन स्मारकों को दुनिया से निहित रखा जाता है। अब ये हमारा ही कर्तव्य है की हम खुद भारत की इन स्थापत्य कलाों को आगे लेकर आए और भारत के इन छुपे हुए खजानो और नगीनों को उजागर करें और दुनिया को यह दिखाएं कि कभी सुना सुनहरा कहे जाने वाले भारत में आज भी चमक मौजूद है।


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