Shri Durga Chalisa Lyrics In Hindi | Durga Chalisa Meaning

Durga Chalisa Lyrics In Hindi

हेलो दोस्तों स्वागत है आपका हमारे इस Blog में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं Shri Durga Chalisa Lyrics In Hindi. हम सभी Durga Chalisa पढ़ते हैं लेकिन सभी को Durga Chalisa Lyrics का मतलब नहीं पता होता क्योंकि अधिकतर लोगों को संस्कृत नहीं आती तो इसलिए आज हम आपके लिए लेकर आये हैं Shri Durga Chalisa Lyrics In Hindi और साथ ही Durga Chalisa Meaning को भी समझ पाएंगे जिससे आप और भी भक्ति भाव के साथ माता की पूजा को सम्पूर्ण कर सकेंगे तो चलिए शुरू करते हैं Durga Chalisa Meaning With Lyrics.

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Durga Chalisa Lyrics

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
माँ को प्रणाम जो सभी को सुख देती है। उस अम्बे माँ को प्रणाम जो सब के दुखों का हरण कर लेती है।

निराकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
हे माँ! आपकी जो ज्योत है वह निराकार अर्थात सिमित न होकर असीम है । यह तीनों जगत में चारों और फैली हुई है

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
चंद्र के समान चमकने वाला आपका मुख बहुत ही विशाल है। आपके नयन लाल और आपकी भौहें विकराल है

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
यह रूप माँ को बहुत अधिक जचता है और जो आपके दर्शन कर लेता है उसे परम सुख प्राप्त होता है।

तुम संसार शक्ति लय कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
इस संसार में जितनी भी शक्तिया है वह आपके अंदर विराजमान है। आप इस संसार का पालन करने हेतु धन और अन्न दोनों प्रदान करती है।

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
अन्नपूर्णा होकर आप इस सरे जग को पालती है। आप अत्यंत सुन्दर है।

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
जब प्रलय होता है तो आप सबका नाश करती है। आप गौरी रूप है और शिव जी को प्रिय भी।

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
योगी और शिव आपका ही गुणगान करते है। ब्रह्मा और विष्णु आपका ही ध्यान करते है

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥
आप ही ने सरस्वती का रूप धारण किया था। आप ही ऋषि और मुनियो के उद्धार के लिए उन्हें सद बुद्धि देती है।

धरा रूप नरसिंह को अम्बा।
प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥
आप खम्बे को चीरते हुए नरसिंह रूप में प्रकट हुई थी।

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
हिरण्यकश्यप को स्वर्ग भेज कर अपने ही प्रह्लाद के प्राणो की रक्षा की।

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
आप ही ने लक्ष्मी स्वरूप धारण किया हुआ है और नारायण के अंग में समाई हुई है

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन ॥
सिंधु समुद्र में भी आप ही विराजमान है। आप सगार है दया का , मेरे मन की आस को पूर्ण करे।

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
हिंगलाज की भवानी माँ आप ही है। आपकी महिमा अनंत है जिसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती है।

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
धूमवती और मातंगी माँ भी आप ही है। आप बगला और भुवनेश्वरी माँ है जो सभी को सुख देती है।

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
श्री भैरव और सारे जग की तारणहरिणी आप ही है। आप छिन्नमाता का स्वरुप है जो सब के दुखो को हल कर देती है।

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
आप माँ भवानी है और सिंह पर सवार होती है। आपके अगुवाई करने के लिए हनुमान आपके आगे चलते है।

कर में खप्पर-खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजे॥
आप के कर कमलो में तलवार तथा ख़प्पर विराजमान रहता है जिसे देख कर समय भी दर के भाग जाता है।

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
अस्त्र और त्रिशूल आपके पास होते है। जिससे शत्रु का हृदय डर के मारे कापने लगता है।

नगर कोटि में तुम्हीं विराजत।
तिहुंलोक में डंका बाजत॥
नगर कोट में आप विध्यमान है। तीनो लोको में आपका ही नाम है।

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥
आपने शुम्भ निशुम्भ जैसे राक्षशों का संहार किया था और असंख्य रक्तबीजो का वध किया।

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
महिषासुर राजा बहुत गर्वी था। जिसके विभिन्न पाप करके धरा को भर रखा था।

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
आपने काली माँ का स्वरुप लेकर उसका उसकी सेना सहित वध कर दिया।

परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
जब भी किसी संत पर कोई विपत्ति आयी है तब माँ आपने उनकी सहायता की है।

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥
अमरपुरी और सब लोक आपके कारन ही शोक से बहुत दूर है।

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
जवालामुखी में आपकी जवाला हमेशा रहती है। और आपको हमेशा ही नर – नारी द्वारा पूजा जाता है।

प्रेम भक्ति से जो यश गावै।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
आपकी यश गाथा का जो भी भक्ति से गायन करता है उसके समीप कभी दुःख या दरिद्र नहीं आता।

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
जिसने भी एकचित होकर आपका स्मरण किया है वो जनम मरण के बंधन से मुक्त हुआ है।

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
जोगी सुर नर और मुनि यही पुकार करते है की बिना आपकी शक्तियों के योग संभव नहीं है।

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
शंकराचार्य ने कठोर तप कर काम और क्रोध पर विजय पायी।

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
प्रतिदिन वह शंकर का ध्यान करते पर आपका स्मरण उन्होंने नहीं किया।

शक्ति रूप को मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
वह शक्ति स्वरुप की महिमा नहीं समझ पाए और जब उनकी शक्ति चली गई तब उन्हें समझ आया।

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
तात्पर्य: तब आपकी शरण में आ गए और आपकी कीर्ति का गान किया। हे भवानी माँ, आपकी सदैव जय हो।

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
जगदम्बा माँ प्रसन्न हुई और बिना विलम्ब किए आपने उन्हें शक्ति दे दी।

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
अर्थार्थ: हे माँ! मैं कष्टों से घिरा हुआ हूँ। आपके सिवा मेरे दुःख का विनाश कौन करे?

आशा तृष्णा निपट सतावे।
मोह मदादिक सब विनशावै॥
तृष्णा और आशा मुझे सताते रहते है। मोह और गर्व ने मेरा नाश किया हुआ है।

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
है महारानी माँ! आप मेरे शत्रुओ का नाश कीजिये। मैं एकाग्रित होकर आपका सुमिरन करता हूँ ।

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥
हे दयालु माता आप आपकी कृपा करो। रिध्धि सिद्धि देकर मुझे निहाल कीजिए।

जब लगि जियउं दया फल पाऊं।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
अर्थार्थ: जब तक में जीवित रहु आपकी दया मुझ पर बानी रहे। और आपकी यश गाथा हमेशा गाता रहूँगा।

दुर्गा चालीसा जो नित गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
तात्पर्य: जो दुर्गा चालीसा का हमेशा गायन करते है। सभी सुख को प्राप्त करते है।

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
सब जान लेने पर देवीदास ने आपकी शरण में आया है। है जगदम्बा भवानी कृपा करो।

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥
यहाँ दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण हुई।

Durga Chalisa Lyrics Video

रोज़ाना दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने के फायदे (Benefits Of Shri Durga Chalisa)

1. प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने मन शांत रहता है साथ ही मन में किसी प्रकार का भय नहीं रहता क्योंकि दुर्गा चालीसा के पाठ से व्यक्ति के आस पास शक्तियों का आगमन होने लगता है जिससे मन में उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के कुविचारों का नाश हो जाता है।

2. दुर्गा चालीसा का पाठ प्रतिदिन करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

3. प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने से शत्रुओं से मुक्ति मिल जाती है।

4. प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने से वित्तीय नुक्सान, संकट, बीमारियों और अलग-अलग प्रकार के दुखों का नाश होता है।

5. मानसिक शक्ति को विकसित करने के लिए भी दुर्गा चालीसा का पाठ किया जाता है। दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने से जीवन को सही दिशा मिलती है एकाग्रता बढ़ती है।

6. नित प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने से माता रानी की कृपा बानी रहती है और घर में भंडार भरे रहते हैं।

7. प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ने से व्यक्ति की छटी इंद्री भी जागृत होने लगती है जिससे उसे भविष्य में होने वाली गतिविधियाँ सपने में दिखने लगती है।

8. दुर्गा चालीसा का पाठ प्रतिदिन करने से सौन्दर्य की प्राप्ति होती है, पुत्र-पौत्र की भी प्राप्ति और साथ ही सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

श्री दुर्गा जी की आरती (Durga Aarti In Hindi)

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ओम जय अम्बे गौरी

मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्जवल से दो‌उ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
ओम जय अम्बे गौरी

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥
ओम जय अम्बे गौरी

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥
ओम जय अम्बे गौरी

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
ओम जय अम्बे गौरी

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥
ओम जय अम्बे गौरी

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥
ओम जय अम्बे गौरी

ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥
ओम जय अम्बे गौरी

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥
ओम जय अम्बे गौरी

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्‍तन की दु:ख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
ओम जय अम्बे गौरी

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥
ओम जय अम्बे गौरी

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
ओम जय अम्बे गौरी

श्री अम्बेजी की आरती, जो को‌ई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥
ओम जय अम्बे गौरी, ओम जय अम्बे गौरी


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